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Tuesday, 11 June 2019

7 Best Short Moral Stories in Hindi for Kids

 arohi      13:01     All Shayeri     No comments   

कहानियों के द्वारा बच्चो को कुछ भी सीखा पाना या उनमे नैतिक मूल्यों को डालने का मेरे ख्याल से काफी अच्छा और सरल तरीका है। राते में सोते समय बच्चो को नैतिक मूल्यों को सीखाने वाली छोटी छोटी हिंदी कहानिया यानि Short Moral Stories in Hindi for Kids न केवल आपको बल्कि बच्चो को भी बेहद पसंद आती है।

ऐसी कहानियों का बच्चो के जीवन पर बहुत अच्छा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और इन कहानियों में दिए गए सन्देश भी बहुत शक्क्तिशाली होते है, जिनसे बच्चो को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इसलिए दोस्तों आज हम आपके साथ ऐसी ही कुछ छोटी छोटी रोचक नैतिक मूल्यों वाली हिंदी कहानियों यानि Short Moral Hindi Stories को आपके साथ शेयर करने जा रहे है। हमे उम्मीद है दोस्तों की आपको नीचे दी गयी ये कहानियाँ बहुत पसंद आएँगी। तो आइये दोस्तों बिना कोई समय गवाए आगे बढ़ते है और पढ़ते है Short Moral Stories in Hindi:

बाडे की कील

एक समय की बात है, एक गााँव में एक गरीब लडका रहता था और वह बहुत ही गुस्सैल प्रवृति का बालक था। वह लड़का बहुत ही छोटी छोटी बात पर अपना आपा खो बैठता था और लोगों को भला-बुरा कह देता था। उसकी इस आदत से परेशाि होकर एक दिन उसके पिताजी ने उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कक की, अब से जिस समय भी तुम्हे गुस्सा आए तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाडे में ठोक देना।

पहले दिन उस लडके को लगभग पैंतालीस बार गुस्सा आया और उसने इतनी ही कीलें बाडे में ठोक दी। कुछ दिनों के बाद जब धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी, उसे लगने लगा की कीले ठोकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है की अपने गुस्से पर काबू किया जाए ताकि वह इस फ़िज़ूल की मेहनत से बच सके।

अगले कुछ हफ्ते में उसे पाया की उसका गुस्सा धीरे धीरे कम हो रहा है। और धीरे धीरे एक समय ऐसा भी आया की उस लड़के को पूरे दिन में एक बार भी गुस्सा नहीं आया। जब उसने अपने पिताजी को यह बात बताई तो उन्होंने फिर उस लड़के को एक काम दे दिया और वह भी बाड़े में से कील निकालने का, उस लड़के के पिताजी ने उस लड़के से अब हर उस दिन बाड़े में से कील निकालने को कहा जिस दिन उसे गुस्सा न आए।

लड़के को अपने पिताजी की कही बातो का मतलब तो समझ में नहीं आया पर लड़के ने ठीक वैसा ही किया। अब धीरे धीरे वह समय भी आ गया जिस दिन बाड़े में एक कील भी नहीं बची।

अब वह लड़का ख़ुशी ख़ुशी अपने पिताजी को यह बात बताने गया। पूरी बात पिताजी को बताने पर उस लड़के के पिताजी उस उसका हाथ पकड़ा और उसे बाड़े की और ले गए और बोले, “बेटा तुमने बहुत अच्छा काम किया है लेकिन क्या तुम इस बाड़े में हुए छेद को देख पा रहे हो, अब यह बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता है जैसा पहले था। जब तुम क्रोध में किसी को कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड जाते हैं।

शिक्षा: तो दोस्तों इस कहानी से हमे यह शिक्षा मिलती है की हमे छोटी छोटी बातो के लिए कभी भी क्रोध नहीं करना चाहिए।

तितली का संघर्ष

एक बार एक आदमी को अपने घर के सामने वाले बाग़ में टहलते हुए एक किसी टहनी से लटकता हुआ एक तितली का एक व्यक्ति को तितली का कोकून दिखाई दिया। उस कोकून से वह तितली बाहर निकलने का भरसक प्रयास कर रही थी। अब वह आदमी भी वहीं बैठ गया और कई घंटो तक उस तितली को उस छोटे से छेद से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करते हुए देखता रहा।

काफी देर तक जब तितली बाहर नहीं निकली तब उस आदमी ने महसूस किया कि तितली कोकून से बाहर नहीं निकल पा रही है और हो सकता है कि वह तितली उसमें फंस गई है।

उस व्यक्ति को तितली पर दया आ गई। उसने सोचा कि अभी तो बेचारी इस तितली ने इस दुनिया में कदम भी नहीं रखा और इसे अभी से इतना संघर्ष करना पड़ रहा है। अब उस व्यक्ति ने तितली की मदद करने का फैसला किया और कैंची से कोकून के बाकी बचे टुकड़े को काट कर तितली को बाहर निकाल दिया।

जब वह तितली बाहर निकली तब उसका शरीर सूजा हुआ और उसके पंख सूखे थे। उसके पंखो का अभी विस्तार भी नहीं हुआ था। पंखों के हरकत में आए बिना वह अब उड़ भी नहीं सकती थी। तितली ने अपना बाकी बचा हुआ जीवन रेंगते हुए और बिना उड़े ही बिता दिया।

मनुष्य ने तितली पर दया तो की थी, पर वो आदमी यह समझ नहीं पाया कि तितली को कोकून से बाहर निकलने से पहले संघर्ष की जरूरत थी। इस प्रक्रिया के जरिये ही उसके शरीर में जमा तरल उसके पंखों तक पहुँचता। जिससे उसके पंख सक्रिय हो जाते। और वह तितली उड़ने के लिए उस कोकून से बाहर आ जाती।

शिक्षा: तो दोस्तों इस कहानी से हमे यह शिक्षा मिलती है की जीवन में हमारा संघर्ष हमारी शक्तियों को विकसित करता है। इसलिए हम सभी का चुनौतियों का डटकर सामना करना बहुत ही जरूरी है।

आज क्यों नहीं

बहुत समय पहले की बात है एक गुरुकुल में एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर व सम्मान किया करता था। वह गुरु भी अपने इस शिष्य पर बहुत अधिक स्नेह रखते थे। शिष्य में एक खराब आदत थी की वह अध्ययन में बहुत आलसी और स्वभाव से बहुत दीर्घसूत्री था। वह शिष्य सदा अपना कार्य कल पर और स्वाध्याय से दूर भागने की कोशिश करता रहता था।

इसके लिए गुरूजी सदैव अपने शिष्य की चिंता करते रहते थे की कही उनका शिष्य जीवन संग्राम में हार ना जाए। क्योंकि आलस्य में व्यक्ति अकर्मण्य और बिना कर्म के फलो का भोगी बनने की कोशिश करता है। आलसी व्यक्ति कभी जल्दी निर्णय नहीं ले सकता और वह कोई निर्णय ले भी लेता है तो उसे समय पर कार्यान्वित नहीं कर पाता है। इसलिए उन्होंने अपने शिष्य का कल्याण करने करने के लिए एक योजना बनाई।

एक दिन गुरूजी ने शिष्य को अपने पास बुलाया और एक काला पत्थर देते हुए कहा की,”में तुम्हे यह जादुई काला पत्थर देकर दो दिन के लिए किसी जरूरी कार्य से बाहर जा रहा हूँ। तुम जिस भी लोहे की वस्तु से इस पत्थर को स्पर्श करोगे वह स्वर्ण में परिवर्तित हो जाएगी। पर याद रहे की दूसरे दिन सूर्यास्त के पश्चात में तुमसे यह पत्थर वापिस ले लूंगा।

शिष्य इस सुअवसर को पाकर बहुत ही प्रसन्न हुआ लेकिन आलसी होने के कारण उसने अपना पहला दिन यह सोचने में ही बिता दिया की कितनी सारी वस्तुए स्वर्ण की बनाई जा सकती है। जब उसके पास इतना सारा स्वर्ण होगा तो उसके पास ढेरो नौकर चाकर होंगे व कितना सुखी, समृद्ध और संतुष्ट होगा, उसके पास इतना धन होगा की उसे पीने के पानी के लिए भी उठना नहीं पड़ेगा।

अगले दिन जब वह सुबह जागा तो उसे यह भली भांति पता था की आज उस पत्थर को रखने का अंतिम दिन है संध्या को गुरूजी आएंगे और उससे वह पत्थर वापिस ले लेंगे। इसलिए उसने मन ही मन यह पक्का विचार बनाया की किसी भी तरह वह आज इस पत्थर से लाभ लेकर ही रहेगा। उसने यह निश्चय किया की वह बाज़ार से बड़ी बड़ी लोहे की वस्तुए लाएगा और उन्हें स्वर्ण में परिवर्तित कर देगा।

परन्तु धीरे धीरे समय चढ़ता गया और अब दोपहर होने आ गयी और दोपहर में उसे खाना खा कर सोने की आदत थी जिस कारण वह संध्या काल तक सोता रहा, जब उठा तो देखा की अब तो बहुत देर हो गयी है तो वह बाजार की तरफ भागने लगा। जब वह बाज़ार की तरफ जाने लगा तब उसे रास्ते में गुरूजी मिले, और गुरूजी को देखते ही शिष्य ने अपने गुरूजी के पैर पकड़ लिए और उनसे जादुई पत्थर को एक दिन और पाने पास रखने की मांग करने लगा।

लेकिन गुरूजी नहीं माने और और उस शिष्य का धनि होने का सपना चूर चूर हो गया। पर इस घटना से शिष्य को जीवन की एक बहुत बड़ी सीख मिली और उसे अपने आलस्य पर पछतावा होने लगा।
वह शिष्य इस बात को समझ गया की आलस्य उसके जीवन का एक बहुत बड़ा अभिशाप है, और उसने इस बात का प्रण लिया की अब से वह कभी भी अपने कार्य से जी नहीं चुराएगा।

शिक्षा: तो दोस्तों इस कहानी से हमे यह शिक्षा मिलती है की हमे कभी भी अपने काम से जी नहीं चुराना चाहिए, कभी भी अपने आज के काम को कल पर नहीं टालना चाहिए।

एक बूढ़ा आदमी

एक बार की बात है एक गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति रहता था। वह अपने आप को दुनिया के सबसे दुर्भाग्यशाली लोगों में से एक थे। पूरा गाँव उसकी इन हरकतो से तंग आ चुका था; वह बूढ़ा व्यक्ति हमेशा उदास रहता था, और लगातार किसी न किसी चीज की शिकायत करता रहता था और हमेशा गुस्से में रहता था।

जितना समय वह इस धरती पर निकाल रहा था उतना ही लोग उससे दूर भागते जा रहे थे, एक तो उसका बुरा स्वभाव और दूसरा उसके कड़वे और भद्दे बोल। गांव के लोग उससे बचते थे, क्योंकि उसका दुर्भाग्य संक्रामक हो गया था। उस वृद्ध व्यक्ति ने अपने साथ साथ दूसरों में नाखुशी की भावना पैदा कर दी थी।

लेकिन एक दिन, जब वह अस्सी साल का हो गया, तो एक अचम्भित करने वाली बात हुई। और तुरंत वह बता पूरे गाँव में फेल गयी की, “बूढ़ा आदमी अब खुश है, वह किसी भी चीज के बारे में शिकायत नहीं करता है, हमेशा मुस्कुराता है, और यहां तक ​​कि वह सबसे हंसी ख़ुशी और अच्छे से बात कर रहा है।”

पूरा गाँव इस बात की सच्चाई जानने के लिए इकट्ठा हो गया। भीड़ इक्क्ठा होने के बाद भीड़ में से एक गाँव के आदमी ने बूढ़े आदमी से पूछा:

ग्रामीण: आपको क्या हुआ?

बूढ़ा आदमी: “कुछ खास नहीं। अस्सी साल मैं खुशी का पीछा कर रहा था, और कभी खुश नहीं रह पाया। और फिर आज मैंने खुशी के बिना जीने का फैसला किया और बस जीवन का आनंद मिल रहा है। इसलिए मैं अब खुश हूं।”

शिक्षा: तो दोस्तों इस कहानी से हमे यह सीख्शा मिलती है की खुशी का पीछा मत करो। जीवन का आनंद लो।

भेड़िया आया

एक बार की बात है एक गांव में एक गड़रिया रहता था जो रोज पहाड़ो पर भेड़े चराने जाता था। एक दिन जब पहाड़ो पर भेड़ के झुंड को देखकर ऊब गया तब उसे एक शरारत करने की सूझी और वह “भेड़िया आया, भेड़िया आया” चिल्लाने लगा। गड़रिये की आवाज सुन आस पास ग्रामीण लोग उसकी मदद को भाग कर आये। जब लोग वहाँ पहुंचे तो वहाँ कुछ भी नहीं था और यह सब देख वह गड़रिया उन लोगो पर हंस रहा था। लोग बहुत गुस्सा हुए और उसे डाँट कर वहाँ से चले गए।

अब दूसरे दिन भी जब गड़रिया अपने भेड़े चराने गया तो उस गड़रिये ने वैसी ही शरारत फिर से की और भेड़िया आया, भेड़िया आया चिल्लाने लगा। फिर आस पास के कुछ ग्रामीण लोग उसकी मदद के लिए आए पर वहाँ कोई भेड़िया नहीं था। अब गाँव वाले यह समझ चुके थे की यह लड़का बहुत शरारती है और किसी बात का विश्वास नहीं किया जा सकता है और उसे चेतावनी देकर फिर वहाँ से चले गये।

तीसरे दिन जब वह गड़रिया अपने भेड़ो को चरा रहा था तब उस गड़रिये ने सचमुच का भेड़िया देखा और भेड़िया आया भेड़िया आया चिल्लाने लगा। लेकिन इस बार उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। और वह भेड़िया धीरे धीर उसकी सारी भेड़ो को खा गया।

शिक्षा: अतः इस कहानी से हमे यह शिक्षा मिलती है दोस्तों की हमे बार बार झूठ नहीं बोलना चाहिए, बार बार झूठ बोलने वाला अगर कभी सच भी बोलेगा तो लोग उसे झूठा ही समझेंगे।

मूर्ख गधा

एक समय की बात है, एक नमक बेचने वाला हर दिन अपने गधे पर लादकर अपनी नमक की थैलियों को बाजार तक बेचने के लिए ले जाता था।

बाज़ार से रास्ते के बीच में एक छोटी सी नदी पड़ती थी जिसे की पार करना पड़ता था। एक दिन गधा अचानक नदी की धारा में गिर गया और नमक की थैलियां भी पानी में गिर गई, नमक पानी में घुल गया और थैलियां ले जाने के लिए बहुत हल्की हो गयी। गधा खुश हो गया।

अब गधा हर दिन यही चाल चलना शुरू कर दिया जब भी वह नदी में जाता तो गिर पड़ता और नमक की थैलियों का बोझ हल्का हो जाता।

कुछ दिनों बाद जब रोज़ रोज़ ऐसा होने लगा तो नमक बेचने वाले को गधे की चाल समझ में आ गयी और उसने गधे को सबक सिखाने का फैसला किया।

अगले दिन उसने गधे पर एक रूई की थैली लाद दी। जैसे ही गधा नदी में गया और गिर पड़ा लेकिन भीगी हुई रूई की थैली अब और भी भारी हो चुकी थी और बोझ उठाना मुश्किल हो रहा था। उस दिन के बाद गधे ने यह चाल नहीं चली, जिससे नमक बेचने वाला अब खुश था।

शिक्षा: इस कहानी से हमे यह सीखा दोस्तों की किस्मत हर बार साथ नहीं देती है।

मूर्ख ऋषि

बहुत समय पहले की बात है, देव शर्मा नाम के एक ऋषि हुआ करते थे जो एक कस्बे के बाहरी इलाके में एक मंदिर में रहते थे। उस ऋषि का आस पास के गाँव में बहुत अधिक नाम था और उन्हें सम्मानित किया जाता था। लोग उनसे मिलने जाते थे, और उनका आशीर्वाद लेने के लिए उन्हें उपहार, भोजन, धन और वस्त्र भेंट करते थे। उन उपहारों की उन्हें खुद के लिए कोई जरूरत नहीं पड़ती थी इसलिए वे इन उपहारों को बेच देते थे, ऐसा करते करते धीरे धीरे वे बहुत अमर बन गए।

ऋषि का स्वभाव ऐसा था की वो किसी पर भरोसा नहीं करते थे।

उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी व्यक्ति पर भरोसा नहीं किया। इसलिए वो अपना सारा पैसा एक थैले में रखते थे, जिसे वे हर समय बांह के नीचे रखते थे। वो एक पल के लिए भी अपने बैग से दूर नहीं होते थे।

एक दिन, एक ठग ऋषि के पास आया, और उसे इस बात का यकीन हो गया की जो थैला ऋषि के पास है उसमे बहुत सारा धन है।

तब उसने ऋषि का बैग चोरी करने की योजना बनाई, लेकिन ऐसा करने का उसे कोई तरीका नहीं सूझ रहा था। फिर कुछ समय पश्चात ठग को यह विचार आया की क्यों न ऋषि का शिष्य बनकर उसे ठगा जाए। अगर मैं एक शिष्य के रूप में उसके साथ रहूं, तो मैं उसका विश्वास जीत सकता हूं। और मौका मिलते ही में उसे लूट लूंगा। पूरी योजना को बना कर ठग ने एक सज्जन व्यक्ति का वेश धारण किया और साधू की कुटिया की तरफ जाने लगा।

जैसे ही वह ठग वहा पहुंचा तो “ओम नमः शिवाय” कहते हुए वह साधू के चरणों में जा गिरा और कहने लगा, “हे गुरुजी, कृपया मुझे जीवन के सही मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन करें। मैं जीवन से तंग आ चुका हूं, और शांति की तलाश करना चाहता हूँ।”

ऋषि ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया, “मेरे बेटे, मैं निश्चित रूप से आपका मार्गदर्शन करूंगा। आप धन्य हैं क्योंकि आप इस छोटी सी उम्र में शांति की तलाश में मेरे पास आए हैं”।

यह वह अवसर था जो ठग चाहता था, और उसने एक बार आशीर्वाद के लिए ऋषि के पैर छुए, “हे गुरुजी, कृपया मुझे अपना शिष्य स्वीकार करें। आप मुझसे जो भी करने को कहेंगे, मैं वही करूंगा।”

ऋषि ने ठग को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया, लेकिन केवल एक शर्त पर। उन्होंने कहा, “मुझे रात में अकेले रहना पसंद है जिससे मुझे ध्यान लगाने में मदद मिलती है। इसलिए, तुम्हे रात में मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। तुम्हे मंदिर के दरवाजे के पास बनी उस झोपड़ी में सोना होगा।”

ठग ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा की, “जो भी आप मुझे करने को कहेंगे मैं आपकी इच्छा को हर तरह से पूरा करूंगा।” और शाम होते होते ऋषि ने अनुष्ठानों की शुरुआत की और औपचारिक रूप से ठग को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया।

अब ठग खुद को आज्ञाकारी शिष्य साबित करने के लिए ऋषि के हाथ पैरो की मालिश करता, मंदिर की सफाई करता और ऋषि की अनुष्ठानों में मदद करता। हालांकि ऋषि अपने शिष्य से खुश था लेकिन ऋषि अभी भी ठग को अपने थैले के आस पास भटकने भी नहीं देता था।

अब धीरे धीरे दिन बीतने के साथ ही ठग ने निराश होना शुरू कर दिया और सोचने लगा की अगर मैं ऋषि को चाकू से मार दूं या उसे जहर खिला दूं तो उस थैले को हासिल कर सकता हूँ।”

जब ठग यह सब सोच रहा था, तो ठग ने एक युवा लड़के को ऋषि से मिलते हुए देखा। वह ऋषि के किसी अनुयायियों में से एक का बेटा था। वह ऋषि को अपने घर के किसी समारोह में आमंत्रित करने आया था।

ऋषि ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया, और कुछ दिनों बाद ठग के साथ समारोह में शामिल होने के लिए शहर के लिए रवाना हो गए। रास्ते में वे एक नदी के पार कर रहे थे, तब ऋषि को नहाने का सूझा। पानी में उतरते समय ऋषि ने अपना धन का थैला देखभाल करने के लिए दे दिया। यह वही अवसर था जिसकी तलाश में वह ठग कब से था। जैसे ही ऋषि नहाने के लिए जैसे ही नदी में उतरे ठग पैसे लेकर भाग गया।

जब ऋषि नहाकर वापस लौटे, तो उन्होंने शिष्य को आसपास नहीं पाया, तो उसे इधर उधर ढूंढने लगे और ढूंढते ढूंढते पैसो के थैले का कपडा जमीन पर गिरा हुआ मिला। अब ऋषि यह जान चुका था की वह व्यक्ति कोई सज्जन पुरुष नहीं बल्कि एक ठग था।

शिक्षा: इसलिए दोस्तों कहते है की एक ठग की चिकनी चुपड़ी बातो में कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए।

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नैतिकता और कुछ नहीं बल्कि एक सीख या सबक है जो हम एक कहानी से सीखते हैं। अगर आप ध्यान दें तो हर कहानी में कुछ न कुछ सीखने को होता है। अपने बच्चों को उनके अनुभवों और उनके दोस्तों या परिवार के अनुभवों से सबक लेना सिखाएं।

तो अंत मेहमे उम्मीद हैं दोस्तों की आपको ऊपर दी गयी Kids Short Hindi Moral Stories बहुत पसंद आयी होंगी तो कृपया कर उन्हें अपने दोस्तों और प्रियजनों के साथ व्हाट्सप्प, फेसबुक और ट्विटर पर शेयर करना न भूले। और कमेंट बॉक्स में हमे जरूर लिख भेजे की कोनसी Short Moral Stories in Hindi for Kids आपको सबसे ज्यादा पसंद आयी।

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